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शान्ति पर्व
अध्याय २२२
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भीष्म उवाच
निन्दाप्रशंसे चात्यर्थं न वदन्ति परस्य ये |  १४   क
न च निन्दाप्रशंसाभ्यां विक्रिय़न्ते कदाचन ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति