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शान्ति पर्व
अध्याय २२२
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भीष्म उवाच
सर्वतश्च प्रशान्ता ये सर्वभूतहिते रताः |  १५   क
न क्रुध्यन्ति न हृष्यन्ति नापराध्यन्ति कस्यचित् |  १५   ख
विमुच्य हृदय़ग्रन्थींश्चङ्कम्यन्ते यथासुखम् ||  १५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति