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वन पर्व
अध्याय २७७
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मार्कण्डेय़ उवाच
अन्तर्हिताय़ां सावित्र्यां जगाम स्वगृहं नृपः |  २०   क
स्वराज्ये चावसत्प्रीतः प्रजा धर्मेण पालय़न् ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति