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वन पर्व
अध्याय २००
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व्याध उवाच
प्रज्ञाचक्षुर्नर इह दोषं नैवानुरुध्यते |  ४८   क
विरज्यति यथाकामं न च धर्मं विमुञ्चति ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति