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वन पर्व
अध्याय २२२
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वैशम्पाय़न उवाच
अमित्रप्रहितांश्चापि गदान्परमदारुणान् |  १३   क
मूलप्रवादैर्हि विषं प्रय़च्छन्ति जिघांसवः ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति