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वन पर्व
अध्याय २२२
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वैशम्पाय़न उवाच
जिह्वय़ा यानि पुरुषस्त्वचा वाप्युपसेवते |  १४   क
तत्र चूर्णानि दत्तानि हन्युः क्षिप्रमसंशय़म् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति