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वन पर्व
अध्याय २२२
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वैशम्पाय़न उवाच
वर्ताम्यहं तु यां वृत्तिं पाण्डवेषु महात्मसु |  १७   क
तां सर्वां शृणु मे सत्यां सत्यभामे यशस्विनि ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति