वन पर्व  अध्याय २२२

वैशम्पाय़न उवाच

प्रणय़ं प्रतिसङ्गृह्य निधाय़ात्मानमात्मनि |  १९   क
शुश्रूषुर्निरभीमाना पतीनां चित्तरक्षिणी ||  १९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति