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वन पर्व
अध्याय २२२
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वैशम्पाय़न उवाच
देवो मनुष्यो गन्धर्वो युवा चापि स्वलङ्कृतः |  २२   क
द्रव्यवानभिरूपो वा न मेऽन्यः पुरुषो मतः ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति