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वन पर्व
अध्याय २२२
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वैशम्पाय़न उवाच
नाभुक्तवति नास्नाते नासंविष्टे च भर्तरि |  २३   क
न संविशामि नाश्नामि सदा कर्मकरेष्वपि ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति