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वन पर्व
अध्याय २२२
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वैशम्पाय़न उवाच
प्रमृष्टभाण्डा मृष्टान्ना काले भोजनदाय़िनी |  २५   क
संय़ता गुप्तधान्या च सुसंमृष्टनिवेशना ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति