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वन पर्व
अध्याय २२२
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वैशम्पाय़न उवाच
अनर्मे चापि हसनं द्वारि स्थानमभीक्ष्णशः |  २७   क
अवस्करे चिरस्थानं निष्कुटेषु च वर्जय़े ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति