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वन पर्व
अध्याय २२२
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वैशम्पाय़न उवाच
यदा प्रवसते भर्ता कुटुम्वार्थेन केनचित् |  २९   क
सुमनोवर्णकापेता भवामि व्रतचारिणी ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति