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वन पर्व
अध्याय २२२
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वैशम्पाय़न उवाच
नित्यमार्यामहं कुन्तीं वीरसूं सत्यवादिनीम् |  ३८   क
स्वय़ं परिचराम्येका स्नानाच्छादनभोजनैः ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति