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वन पर्व
अध्याय २२२
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वैशम्पाय़न उवाच
केन द्रौपदि वृत्तेन पाण्डवानुपतिष्ठसि |  ४   क
लोकपालोपमान्वीरान्यूनः परमसंमतान् |  ४   ख
कथं च वशगास्तुभ्यं न कुप्यन्ति च ते शुभे ||  ४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति