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वन पर्व
अध्याय २२२
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वैशम्पाय़न उवाच
शतं दासीसहस्राणि कौन्तेय़स्य महात्मनः |  ४४   क
कम्वुकेय़ूरधारिण्यो निष्ककण्ठ्यः स्वलङ्कृताः ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति