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वन पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
एष नार्थविहीनेन शक्यो राजन्निषेवितुम् |  ४६   क
अखिलाः पुरुषव्याघ्र गुणाः स्युर्यद्यपीतरे ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति