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कर्ण पर्व
अध्याय ४५
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सञ्जय़ उवाच
एवमुक्त्वा महाराज सूतपुत्रः प्रतापवान् |  ३३   क
प्रगृह्य विजय़ं वीरो धनुःश्रेष्ठं पुरातनम् |  ३३   ख
सज्यं कृत्वा महाराज संमृज्य च पुनः पुनः ||  ३३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति