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सभा पर्व
अध्याय ६१
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विदुर उवाच
यः पुनर्वितथं व्रूय़ाद्धर्मदर्शी सभां गतः |  ५७   क
अनृतस्य फलं कृत्स्नं सम्प्राप्नोतीति निश्चय़ः ||  ५७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति