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द्रोण पर्व
अध्याय १०४
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धृतराष्ट्र उवाच
गदामुद्यच्छमानस्य कालस्येव महामृधे |  ३   क
न हि पश्याम्यहं तात यस्तिष्ठेत रणाजिरे ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति