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वन पर्व
अध्याय २२२
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वैशम्पाय़न उवाच
अनिशाय़ां निशाय़ां च सहाय़ाः क्षुत्पिपासय़ोः |  ५५   क
आराधय़न्त्याः कौरव्यांस्तुल्या रात्रिरहश्च मे ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति