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वन पर्व
अध्याय २२२
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वैशम्पाय़न उवाच
तच्छ्रुत्वा धर्मसहितं व्याहृतं कृष्णय़ा तदा |  ५८   क
उवाच सत्या सत्कृत्य पाञ्चालीं धर्मचारिणीम् ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति