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आदि पर्व
अध्याय २२३
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जरितारिरु उवाच
पुरतः कृच्छ्रकालस्य धीमाञ्जागर्ति पूरुषः |  १   क
स कृच्छ्रकालं सम्प्राप्य व्यथां नैवैति कर्हिचित् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति