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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः सन्धाय़ ते सर्वे वाक्यान्यथ समासतः |  १०   क
एकस्मिन्व्राह्मणे राजन्नावेश्योचुर्नराधिपम् ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति