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शान्ति पर्व
अध्याय २२३
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वासुदेव उवाच
कृतश्रमः कृतप्रज्ञो न च तृप्तः समाधितः |  २०   क
निय़मस्थोऽप्रमत्तश्च तस्मात्सर्वत्र पूजितः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति