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वन पर्व
अध्याय २५०
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वैशम्पाय़न उवाच
एका ह्यहं सम्प्रति तेन वाचं; ददानि वै भद्र निवोध चेदम् |  ३   क
अहं ह्यरण्ये कथमेकमेका; त्वामालपेय़ं निरता स्वधर्मे ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति