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वन पर्व
अध्याय २२३
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द्रौपद्यु उवाच
सुखं सुखेनेह न जातु लभ्यं; दुःखेन साध्वी लभते सुखानि |  ४   क
सा कृष्णमाराधय़ सौहृदेन; प्रेम्णा च नित्यं प्रतिकर्मणा च ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति