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वन पर्व
अध्याय २२३
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द्रौपद्यु उवाच
श्रुत्वा स्वरं द्वारगतस्य भर्तुः; प्रत्युत्थिता तिष्ठ गृहस्य मध्ये |  ६   क
दृष्ट्वा प्रविष्टं त्वरितासनेन; पाद्येन चैव प्रतिपूजय़ त्वम् ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति