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द्रोण पर्व
अध्याय ६१
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धृतराष्ट्र उवाच
हिमात्यये यथा कक्षं शुष्कं वातेरितो महान् |  ४६   क
अग्निर्दहेत्तथा सेनां मामिकां स धनञ्जय़ः ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति