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शान्ति पर्व
अध्याय १८६
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भीष्म उवाच
स्वदेशे परदेशे वा अतिथिं नोपवासय़ेत् |  १४   क
काम्यं कर्मफलं लव्ध्वा गुरूणामुपपादय़ेत् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति