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आदि पर्व
अध्याय २२४
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मन्दपाल उवाच
नाहमेवं चरे लोके यथा त्वमभिमन्यसे |  १४   क
अपत्यहेतोर्विचरे तच्च कृच्छ्रगतं मम ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति