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शान्ति पर्व
अध्याय २७०
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भीष्म उवाच
अय़त्नसाध्यं मुनय़ो वदन्ति; ये चापि मुक्तास्त उपासितव्याः |  १२   क
त्वय़ा च लोकेन च सामरेण; तस्मान्न शाम्यन्ति महर्षिसङ्घाः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति