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आदि पर्व
अध्याय २१३
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वैशम्पाय़न उवाच
तत्र तत्र महापानैरुत्कृष्टतलनादितैः |  ५४   क
यथाय़ोगं यथाप्रीति विजह्रुः कुरुवृष्णय़ः ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति