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शान्ति पर्व
अध्याय २५७
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युधिष्ठिर उवाच
शरीरमापदश्चापि विवदन्त्यविहिंसतः |  १२   क
कथं यात्रा शरीरस्य निरारम्भस्य सेत्स्यति ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति