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शान्ति पर्व
अध्याय २२४
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भीष्म उवाच
मनः सृष्टिं विकुरुते चोद्यमानं सिसृक्षय़ा |  ३५   क
आकाशं जाय़ते तस्मात्तस्य शव्दो गुणो मतः ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति