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द्रोण पर्व
अध्याय १४८
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सञ्जय़ उवाच
पश्य कर्णं महेष्वासं धनुष्पाणिमवस्थितम् |  २१   क
निशीथे दारुणे काले तपन्तमिव भास्करम् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति