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शान्ति पर्व
अध्याय २२४
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भीष्म उवाच
पौरुषं कर्म दैवं च फलवृत्तिस्वभावतः |  ५१   क
त्रय़ एतेऽपृथग्भूता नविवेकं तु केचन ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति