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शान्ति पर्व
अध्याय २२४
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भीष्म उवाच
एवमेतच्च नैवं च यद्भूतं सृजते जगत् |  ५२   क
कर्मस्था विषमं व्रूय़ुः सत्त्वस्थाः समदर्शिनः ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति