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भीष्म पर्व
अध्याय १०५
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सञ्जय़ उवाच
जय़न्तं पाण्डवं दृष्ट्वा त्वत्सैन्यं चाभिपीडितम् |  १४   क
दुर्योधनस्ततो भीष्ममव्रवीद्भृशपीडितः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति