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वन पर्व
अध्याय २२४
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वैशम्पाय़न उवाच
स्मय़ित्वा तु यदुश्रेष्ठो द्रौपदीं परिसान्त्व्य च |  १७   क
उपावर्त्य ततः शीघ्रैर्हय़ैः प्राय़ात्परन्तपः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति