वन पर्व  अध्याय २२४

वैशम्पाय़न उवाच

कृष्णे मा भूत्तवोत्कण्ठा मा व्यथा मा प्रजागरः |  ४   क
भर्तृभिर्देवसङ्काशैर्जितां प्राप्स्यसि मेदिनीम् ||  ४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति