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आदि पर्व
अध्याय २२५
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वैशम्पाय़न उवाच
वासुदेवोऽपि जग्राह प्रीतिं पार्थेन शाश्वतीम् |  १३   क
ददौ च तस्मै देवेन्द्रस्तं वरं प्रीतिमांस्तदा ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति