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आदि पर्व
अध्याय २२५
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वैशम्पाय़न उवाच
पावकश्चापि तं दावं दग्ध्वा समृगपक्षिणम् |  १५   क
अहानि पञ्च चैकं च विरराम सुतर्पितः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति