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आदि पर्व
अध्याय २२५
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वैशम्पाय़न उवाच
परिक्रम्य ततः सर्वे त्रय़ोऽपि भरतर्षभ |  १९   क
रमणीय़े नदीकूले सहिताः समुपाविशन् ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति