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शान्ति पर्व
अध्याय २२१
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भीष्म उवाच
अथेङ्गितं वज्रधरस्य नारदः; श्रिय़ाश्च देव्या मनसा विचारय़न् |  ८८   क
श्रिय़ै शशंसामरदृष्टपौरुषः; शिवेन तत्रागमनं महर्द्धिमत् ||  ८८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति