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वन पर्व
अध्याय २२५
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जनमेजय़ उवाच
एवं वने वर्तमाना नराग्र्याः; शीतोष्णवातातपकर्शिताङ्गाः |  १   क
सरस्तदासाद्य वनं च पुण्यं; ततः परं किमकुर्वन्त पार्थाः ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति