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वन पर्व
अध्याय २२५
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वैशम्पाय़न उवाच
प्रवोध्यते मागधसूतपूगै; र्नित्यं स्तुवद्भिः स्वय़मिन्द्रकल्पः |  १०   क
पतत्रिसङ्घैः स जघन्यरात्रे; प्रवोध्यते नूनमिडातलस्थः ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति