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वन पर्व
अध्याय २२५
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वैशम्पाय़न उवाच
कथं नु वातातपकर्शिताङ्गो; वृकोदरः कोपपरिप्लुताङ्गः |  ११   क
शेते पृथिव्यामतथोचिताङ्गः; कृष्णासमक्षं वसुधातलस्थः ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति