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वन पर्व
अध्याय २२५
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वैशम्पाय़न उवाच
तथार्जुनः सुकुमारो मनस्वी; वशे स्थितो धर्मसुतस्य राज्ञः |  १२   क
विदूय़मानैरिव सर्वगात्रै; र्ध्रुवं न शेते वसतीरमर्षात् ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति