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वन पर्व
अध्याय २२५
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वैशम्पाय़न उवाच
यमौ च कृष्णां च युधिष्ठिरं च; भीमं च दृष्ट्वा सुखविप्रय़ुक्तान् |  १३   क
विनिःश्वसन्सर्प इवोग्रतेजा; ध्रुवं न शेते वसतीरमर्षात् ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति